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इतने ऊँचे उठो (कविता)

 इतने ऊँचे उठो (कविता) इतने ऊंचे उठो कि जितना उठा गगन है देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, क्षमता की भाव वृष्टि से। जाति भेद की, धर्म द्वेष की ज्वालाओं से जलते जग में इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है  नए हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो  नई तूलिका से चित्रों के रंग उभारो । नए राग को नूतन स्वर दो भाषा को नूतन अक्षर दो  युग की नई मूर्ति-रचना में इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है।। लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है  जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है।  तोड़ो बंधन, रुके न चिंतन गति, जीवन का सत्य चिरंतन  धारा के शाश्वत प्रवाह में  इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है ॥ चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना  अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना ।  सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे  सब हैं प्रतिपल साथ हमारे  दो कुरूप को रूप सलोना  इतने सुंदर बनो कि जितना आकर्षण है।। - द्वारिका प्रसाद

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल !

  मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर! सौरभ फैला विपुल धूप बन मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन! दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल पुलक-पुलक मेरे दीपक जल! तारे शीतल कोमल नूतन माँग रहे तुझसे ज्वाला कण; विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं हाय, न जल पाया तुझमें मिल! सिहर-सिहर मेरे दीपक जल! जलते नभ में देख असंख्यक स्नेह-हीन नित कितने दीपक जलमय सागर का उर जलता; विद्युत ले घिरता है बादल! विहँस-विहँस मेरे दीपक जल! द्रुम के अंग हरित कोमलतम ज्वाला को करते हृदयंगम वसुधा के जड़ अन्तर में भी बन्दी है तापों की हलचल; बिखर-बिखर मेरे दीपक जल! मेरे निस्वासों से द्रुततर, सुभग न तू बुझने का भय कर। मैं अंचल की ओट किये हूँ! अपनी मृदु पलकों से चंचल सहज-सहज मेरे दीपक जल! सीमा ही लघुता का बन्धन है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन मैं दृग के अक्षय कोषों से- तुझमें भरती हूँ आँसू-जल! सहज-सहज मेरे दीपक जल! तुम असीम तेरा प्रकाश चिर खेलेंगे नव खेल निरन्तर, तम के अणु-अणु में विद्युत-सा अमिट चित्र अंकित करता चल, सरल-सरल मेरे दीपक जल! तू जल-जल जितना...